विकास, संस्कृति और आधुनिकता का संगम रायगढ़
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रायगढ़ को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में भी जाना जाता है। विशेष रूप से संगीत और नृत्य के क्षेत्र में रायगढ़ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रसिद्ध रायगढ़ घराना भारतीय शास्त्रीय नृत्य, विशेषकर कथक की परंपरा में अपनी अलग पहचान रखता है। यहाँ आयोजित होने वाला चक्रधर समारोह देश-प्रदेश के ख्यातिप्राप्त कलाकारों को आकर्षित करता है और रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करता है।
भौगोलिक दृष्टि से रायगढ़ का क्षेत्र प्राकृतिक संपदा से समृद्ध है। जिले में कृषि के साथ-साथ कोयला, बिजली, इस्पात तथा अन्य औद्योगिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इसके कारण रायगढ़ छत्तीसगढ़ के प्रमुख औद्योगिक जिलों में शामिल है। रायगढ़ की पहचान केवल उद्योग और आर्थिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है। यहाँ की ऐतिहासिक धरोहर, धार्मिक स्थल, प्राकृतिक सौंदर्य, लोक परंपराएँ और सांस्कृतिक गतिविधियाँ इसे पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती हैं। सिंघनपुर की शैलचित्र गुफाएँ, राम झरना और अन्य प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक स्थल जिले की विविधता को दर्शाते हैं। वर्तमान समय में रायगढ़ शिक्षा, खेल, पर्यटन, यातायात, पर्यावरण संरक्षण और शहरी अधोसंरचना के क्षेत्र में निरंतर विकास कर रहा है। पारंपरिक संस्कृति और आधुनिक विकास के संतुलन के साथ रायगढ़ छत्तीसगढ़ के एक महत्वपूर्ण एवं संभावनाशील जिले के रूप में आगे बढ़ रहा है। इस प्रकार, रायगढ़ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, औद्योगिक शक्ति और विकास की संभावनाओं का सुंदर संगम है, जो अपनी विशिष्ट पहचान के साथ राज्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
रायगढ़ सड़क मार्ग से भी अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। रायपुर से निजी वाहन, टैक्सी और बस के माध्यम से आसानी से रायगढ़ पहुँचा जा सकता है। रायपुर से बिलासपुर होते हुए खरसिया की दिशा में जाने वाला मार्ग रायगढ़ को राज्य के प्रमुख शहरों से जोड़ता है। सड़क संपर्क बेहतर होने के कारण जिले के विभिन्न क्षेत्रों तक आवागमन भी सुगम हुआ है। रायपुर से रायगढ़ की दूरी सड़क मार्ग से लगभग 230 से 250 किलोमीटर के आसपास है। मार्ग, यातायात और परिवहन के साधन के अनुसार दूरी एवं यात्रा का समय कुछ अलग हो सकता है। सामान्यतः सड़क मार्ग से रायपुर से रायगढ़ पहुँचने में लगभग 4 से 5 घंटे का समय लगता है।
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रायगढ़ः शैलचित्रों की दुर्लभ श्रृंखला का गढ़
शैल चित्रों के रूप में हजारों सालों में मानव सभ्यता के विकास की अमिट छाप है दर्ज
रायगढ़ जिले में हजारों वर्ष पुराने पाषाणकालीन समृद्ध शैलचित्रों का खजाना है, जो न केवल देश एवं प्रदेश में बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। ऐसी दुर्लभ पुरासंपदा हमारी प्राचीन सभ्यता के जीवंत अमूल्य अवशेष है। जिले में आदिम मानवों द्वारा सिंघनपुर, करमागढ़, कबरापहाड़, ओंगना, नवागढ़ पहाड़ी, बसनाझर, भैंसगढ़ी, खैरपुर, बेनिपाट, पंचभैया पहाड़, राबकोब गुफा, सारंगढ़ के सिरौलीडोंगरी जैसे अनेक स्थानों में शैलाश्रय में शैलचित्र उकेरे गए है, जिनमें पशु-पक्षी, आखेट के दृश्य, परम्परा, जीवनशैली, पर्व एवं त्यौहार का चित्रांकन दीवारों पर किया गया है। ऐसे रॉक पेंटिंग विश्व के अन्य देशों फ्रांस, स्पेन, आस्ट्रेलिया एवं मेक्सिको में भी पाये गए हैं। प्रागैतिहासिक काल में आदिम मानव इन सघन एवं दुर्गम पहाडिय़ों में गुफाओं एवं कंदराओं में निवास करते थे और यहां सभ्यता का विकास होता गया। आदिम कुशल चित्रकारों द्वारा बनाये इन शैलचित्रों में उनकी जीवनशैली एवं परिवेश की अनुगूंज सुनाई देती है, जिसकी भावनात्मक अभिव्यक्ति इन रेखाचित्रों के रूप में उभरकर सामने आती है। आदिमानव रंगों के प्रयोग से अनभिज्ञ नहीं थे। यह शैलचित्र हमारे पुरखों द्वारा दिया गया बहुमूल्य उपहार है।
हमीरपुर रोड से कुछ दूरी पर सघन वनों के बीच प्राकृतिक छटा से घिरी रमणीय करमागढ़ की पहाडिय़ों के बीच श्उषा कोट्यि शैलाश्रय में पाषाणकालीन आदिम मानवों ने गहरे गैरिक रंग से ग्रामीण जन-जीवन को प्रदर्शित करते हुए विभिन्न पशुओं एवं सुंदर श्रृंखलाओं में ज्यामितीय आकृतियां चट्टानों में अंकित किए हैं। उषा कोटि में धान की बालियां, चांद, ढेकी, हिरन, खरगोश, बारहसिंघा, कछुआ, हाथी, छिपकली, मेंढक, बैल, पेड़-पौधे, मोती की सुंदर लडिय़ों जैसी आकृतियां स्पष्ट नजर आती है। विख्यात पुरातत्वविद स्व.पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय ने इसकी तुलना अमेरिका के गुफा चित्रों से की थी। उडिय़ा संस्कृति से प्रभावित इन शैलचित्रों में घर, आंगन एवं दीवारों में पर्व के अवसर पर सजाने के लिए अल्पना सदृश्य खूबसूरत चित्र बनाये गये है। वैसे ही कमल के फूल, गेहू एवं धान की बालियां एवं तरह-तरह के अनोखी कलात्मक आकृतियां बनी हुई है। शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा इन शैलचित्रों को संरक्षित किया जा रहा है। ग्रामीण यहां त्यौहार के अवसर पर ग्राम देवता के रूप में पूर्वजों की पूजा करने आते है।
रायगढ़ जिला मुख्यालय से 20 किलो मीटर दूर भूपदेवपुर के समीप ग्राम सिंघनपुर के समीप मैकल पर्वत श्रेणी में लगभग 2 हजार फीट की ऊंचाई पर मनोरम पहाडिय़ों के बीच जैव विविधता से परिपूर्ण सिंघनपुर की अद्वितीय गुफा है, जहां गैरिक रंग में मानव शरीर का आकार सीढ़ीनुमा सदृश, मानव आकृतियां एवं पशु-पक्षी की आकृतियां बनी हुई है। सिंघनपुर की पहाडिय़ों में तीन गुफाएं हैं, जिनमें से दो दक्षिणमुखी है एवं तीसरा पूर्वमुखी है। पूर्वमुखी गुफा जिसके बाह्य भाग में शैल चित्र है, जहां जाना भी कठिन ही है। प्रागैतिहासिक शैलाश्रय की पुष्टि 19 वीं शताब्दी के मध्य पुरातत्व अधिकारी श्री ए.सी.करलेले ने की थी। आदिम युगीन के इन शैलचित्रों को स्व.एंडरसन ने 1912 ईसवीं में पहली बार देखा था। उन्होंने 1918 में इंडियन म्यूजियम ऑफ कलकत्ता के निदेशक श्री पर्सी ब्राउन को इसकी जानकारी दी थी, जिन्होंने अपनी पुस्तक इंडियन पेंटिंग में शैलचित्रों का जिक्र किया था। स्व.श्री एंडरसन अपने साथी श्री राबर्टसन के साथ सिंघनपुर की गुफा गए थे और यहां का अन्वेषण किया। इसी दौरान गुफा में मधुमक्खियों के काटने से राबर्टसन की मृत्यु हो गयी। उनकी स्मृति में रेलवे स्टेशन का नाम रॉबर्टसन रखा गया है। पर्सी ब्राउन के बाद कई पुरातत्वविद सर हेनरी हडवे, श्री व्ही स्मिथ, अमरनाथ दत्ता और पंडित लोचन प्रसाद पांडेय ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। सिंघनपुर की गुफा, पुरातत्वविदों के लिए जिज्ञासा एवं कौतुहल से भरी हुई है।
रायगढ़ से 15 किलो मीटर दूर लोईंग से कुछ दूर पर कबरापहाड़ में पाषाण युग के विशिष्ट शैलचित्र है। जहां गैरिक रंग में छिपकली, हिरण, जंगली भैसा, बारहसिंघा, मेंढक, कछुआ, चक्र, जंगली भैसा मानव आकृतियां एवं विभिन्न प्रकार की ज्यामितियां आकृतियां है। यहां बने चक्र की खासियत यह है कि इसमें 36 लकीर बनी हुई है। पुरातत्वविदों के अनुसार कबरा पहाडिय़ों के शैलचित्र लगभग 5000 वर्ष पुराने हैं। ग्रामवासी इन शैलचित्रों की पूजा करते है।
रायगढ़ से लगभग 70 किलोमीटर दूर धरमजयगढ़ विकासखण्ड मुख्यालय से ग्राम ओंगना 4 किलोमीटर दूर है। वहां समीप के पहाडिय़ों में शैलाश्रय में मोहक शैलचित्र बने हुए है। ओंगना के शैलचित्र मानवीय सभ्यता के क्रम को प्रगट करते है। यहां तीन मानव की आकृतियां है। सामूहिक नृत्य का चित्रांकन, बैल की आकृति, साज-सज्जा वाली मानव आकृतियां है। ग्रामीण इसे देव स्थान के रूप में मानते है।
धरमजयगढ़ से 17 किलोमीटर दूर पंचभैया पहाड़ी पर प्राचीन महत्व के शैलचित्र हैं। ऐसी किवदंति है कि प्राचीन काल में पांचों पांडवों ने यहां रूककर विश्राम किया था। पहाड़ी के कटाव पर शैलचित्र हैं, जो गेरूए रंग से बने हुए हैं। इस पहाड़ पर हाथा नामक स्थान है, जहाँ चट्टानों पर 34 पंजों के निशान मिले हैं। वन्दनखोह गुफा के शैलचित्र, घोड़ी डोंगरी पहाड़ी के शैलचित्र, सिसरिंगा के चिनिडंड पहाड़ी के शैलचित्र एवं वोडरा कछार पहाड़ी के शैलचित्र अनूठे हैं। धरमजयगढ़ की राबकोब गुफा के शैलचित्र विशेष हैं। यह स्थल धरमजयगढ़ के ग्राम पोटिया के समीप पहाड़ी की तलहटी में अवस्थित है। कार्बन डेटिंग से गुफा में निर्मित शैलचित्र 20 से 30 हजार वर्ष पुराना निर्धारित किया गया है।
रायगढ़ से दक्षिण दिशा में 8 किलोमीटर दूर ब्रम्हनीन पहाड़ी पर बसनाझर पहाड़ी के गुफाओं एवं कंदराओं में अनगिनत शैलचित्र बिखरे हुए है। स्व.श्री एंडरसन द्वारा सिंघनपुर के शैलचित्रों के खोज के बाद बसनाझर के शैलचित्र पर भी अनुसंधान किया गया। पुरातत्वविदों के अनुसार ये शैलचित्रों 10 हजार ईसा पूर्व के है। ये शैलचित्र प्रस्तर युग तथा नवीन प्रस्तर युग के है। जिनमें आखेट युग को भी दर्शित किया गया है। आदिम शैलचित्रकारों ने आखेट दृश्य को प्रस्तुत किया है। यहां हिरण मानव आकृतियां एवं खेती तथा पशुपालन, सूर्यचक्र, देव आकृति प्रदर्शित किए गए है। जिले में प्रागैतिहासिक कालीन शैलचित्रों में प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति उत्कृष्ट रूप में अभिव्यक्त हुई है और यह पुरातत्वविदों के लिए अनुकरणीय है। रहस्य एवं रोमांच से भरपूर इन शैलचित्रों में अभी भी बहुत कुछ खोजना शेष है। इन कहानियों को क्रमिकता में समझने की जरूरत है, कि उस काल में जीवन किस तरह का था और रचनात्मकता किस तरह की थी। इनका सही वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर मानव विकास के क्रम की कई तस्वीरें सामने आएगी।
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राम झरना: आस्था और प्रकृति का संगम
राम झरना छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की खरसिया तहसील के अंतर्गत भूपदेवपुर में स्थित एक प्रसिद्ध प्राकृतिक जलस्रोत एवं पर्यटन स्थल है। रायगढ़ शहर से इसकी दूरी लगभग 18-20 किलोमीटर और खरसिया से लगभग 12 किलोमीटर है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान इस क्षेत्र से गुजरे थे। मान्यता है कि वनवास के दौरान माता सीता को प्यास लगने पर भगवान श्रीराम ने धरती पर बाण चलाया, जिससे जलधारा फूट पड़ी। इसी जल को पीकर माता सीता ने अपनी प्यास बुझाई थी। इसी मान्यता के कारण इस स्थान का नाम राम झरना पड़ा।
राम झरना घने जंगलों, हरियाली और शांत प्राकृतिक वातावरण से घिरा हुआ है। यह स्थान विशेष रूप से पिकनिक और प्रकृति-प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। सर्दियों और छुट्टियों के दौरान यहाँ बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। पड़ोसी राज्यों ओडिशा, झारखंड और बिहार से भी पर्यटकों के आने की बात कही जाती है। प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक आस्था का अनूठा संगम होने के कारण राम झरना रायगढ़ जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में अपना विशेष स्थान रखता है।
बोतल्दा जलप्रपात (अटल रॉक गार्डन)
बोतल्दा जलप्रपात, जिसे अटल रॉक गार्डन के नाम से भी जाना जाता है, छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के खरसिया क्षेत्र में स्थित एक आकर्षक प्राकृतिक एवं पिकनिक स्थल है। यह रायगढ़ से लगभग 40 किलोमीटर तथा सक्ती जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऊँची पहाड़ियों, घने पेड़ों, हरियाली और बहते झरने से घिरा यह स्थान प्रकृति प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण रखता है। वर्षा ऋतु के बाद यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य और भी निखर जाता है। शांत वातावरण और मनमोहक दृश्य इसे परिवार एवं दोस्तों के साथ पिकनिक, प्रकृति भ्रमण और फोटोग्राफी के लिए उपयुक्त बनाते हैं। बोतल्दा जलप्रपात रायगढ़ और आसपास के क्षेत्रों के लोगों के बीच एक लोकप्रिय पर्यटन एवं पिकनिक स्थल के रूप में अपनी पहचान बना चुका है।
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मोती महल
मोती महल रायगढ़ की राजसी और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल है। यह महल रायगढ़ के राजपरिवार, उनकी कला-प्रियता और तत्कालीन सांस्कृतिक वैभव की झलक प्रस्तुत करता है। महल की वास्तुकला में पारंपरिक राजसी निर्माण शैली, विशाल कक्ष और आकर्षक स्थापत्य की विशेषताएँ दिखाई देती हैं। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इसका निर्माण महाराजा भूपदेव सिंह के शासनकाल से संबंधित माना जाता है तथा यह राजा चक्रधर सिंह के समय की समृद्ध राजसी विरासत से भी जुड़ा रहा है। मोती महल रायगढ़ के इतिहास, कला, संस्कृति और राजपरंपरा को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्थल है। इसकी पुरानी वास्तुकला और ऐतिहासिक परिवेश पर्यटकों को रायगढ़ के गौरवशाली अतीत से परिचित कराते हैं।
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टीपा खोल: प्राकृतिक पिकनिक स्थल
टीपा खोल रायगढ़ शहर के निकट स्थित एक लोकप्रिय प्राकृतिक एवं पिकनिक स्थल है। यह रायगढ़ तहसील के अंतर्गत चिरईपानी और खैरपुर क्षेत्र के पास स्थित है तथा रायगढ़ शहर से लगभग 10-13 किलोमीटर की दूरी पर है। जल क्षेत्र, हरियाली और शांत प्राकृतिक वातावरण से घिरा टीपा खोल परिवार एवं मित्रों के साथ पिकनिक, प्रकृति भ्रमण और फोटोग्राफी के लिए आकर्षक स्थान है। शहर की भीड़-भाड़ से दूर यहाँ प्रकृति के बीच कुछ समय बिताने का आनंद लिया जा सकता है।
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केलो नदी एवं केलो बाँध
केलो नदी रायगढ़ क्षेत्र की प्रमुख नदियों में से एक है और जिले के प्राकृतिक एवं आर्थिक जीवन में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। इसी नदी पर निर्मित केलो बाँध रायगढ़ जिले की महत्वपूर्ण सिंचाई एवं जल प्रबंधन परियोजनाओं में शामिल है। यह बाँध रायगढ़ शहर से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। केलो बाँध का प्रमुख उद्देश्य आसपास के क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा को बेहतर बनाना और जल संसाधनों का समुचित प्रबंधन करना है। बाँध का विस्तृत जलाशय, आसपास फैली हरियाली और शांत प्राकृतिक वातावरण इसे पर्यटन की दृष्टि से भी आकर्षक बनाते हैं। यहाँ विकसित पार्क एवं हरित क्षेत्र परिवार और मित्रों के साथ पिकनिक मनाने तथा प्रकृति के बीच कुछ समय बिताने के लिए उपयुक्त हैं। विशेषकर शांत वातावरण और जलाशय का मनमोहक दृश्य पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। प्राकृतिक सुंदरता और उपयोगी जल परियोजना का यह संगम केलो बाँध को रायगढ़ के महत्वपूर्ण स्थानीय पर्यटन स्थलों में स्थान देता है।
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गौरी शंकर मंदिर: आस्था, इतिहास और परंपरा का संगम
रायगढ़ शहर के इतवारी बाजार संडे मार्केट के पास स्थित गौरी शंकर मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी इस मंदिर का विशेष महत्व है। वर्षों से यह मंदिर रायगढ़वासियों की धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। गौरी शंकर मंदिर का निर्माण मार्च 1948 में पूरा हुआ था। मंदिर के निर्माण में रायगढ़ के प्रसिद्ध दानवीर सेठ किरोड़ीमल का विशेष योगदान रहा। बताया जाता है कि उन्होंने मंदिर की मूर्तियों और आंतरिक साज-सज्जा के लिए मुंबई से विशेष कारीगरों को बुलवाया था। मंदिर की बनावट और कलात्मक सज्जा आज भी इसके ऐतिहासिक स्वरूप की झलक देती है।
महाशिवरात्रि और सावन में उमड़ते हैं श्रद्धालु
भगवान शिव को समर्पित होने के कारण महाशिवरात्रि और सावन के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करते हैं। सावन के दिनों में मंदिर का वातावरण विशेष रूप से भक्तिमय हो जाता है।
जन्माष्टमी मेला है खास आकर्षण
गौरी शंकर मंदिर की एक खास पहचान यहां होने वाला जन्माष्टमी उत्सव और मेला भी है। कई दशकों से जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर परिसर में आकर्षक और स्वचालित झांकियां सजाई जाती हैं। इन झांकियों को देखने के लिए रायगढ़ शहर के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। धार्मिक उत्सव के साथ यह आयोजन शहर की सांस्कृतिक परंपरा का भी हिस्सा बन चुका है।
रायगढ़ के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल
ऐतिहासिक विरासत, धार्मिक आस्था और वर्षों पुरानी परंपराओं के कारण गौरी शंकर मंदिर रायगढ़ आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण स्थल है। शहर के मध्य स्थित होने के कारण यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। मंदिर की धार्मिक मान्यताएं और यहां आयोजित होने वाले प्रमुख पर्व इसे रायगढ़ के धार्मिक पर्यटन की महत्वपूर्ण पहचान बनाते हैं।
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खुले आसमान के नीचे 25 वर्षों से तपस्या में लीन कोसमनारा बाबा
रायगढ़ का प्रसिद्ध बाबा धाम बना श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र
जिला मुख्यालय से करीब 7 किलोमीटर दूर कोसमनारा गांव में स्थित बाबा धाम आस्था और अध्यात्म का प्रमुख केंद्र है। यहां श्री सत्यनारायण बाबा पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से खुले आसमान के नीचे एक ही स्थान पर तपस्या में लीन हैं। गर्मी की तपती धूप हो, कड़ाके की सर्दी या बारिश, बाबा हर मौसम में खुले स्थान पर ही साधना करते हैं। वे मौन व्रत धारण किए हुए हैं और न किसी से बातचीत करते हैं, न ही अपने स्थान से उठते हैं। बाबा की कठिन तपस्या को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। स्थानीय मान्यता के अनुसार जिस स्थान पर बाबा तपस्या कर रहे हैं, वह कभी बंजर भूमि हुआ करती थी। समय के साथ यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया और आज यहां दूर-दूर से लोग दर्शन एवं आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों से भी श्रद्धालु कोसमनारा बाबा धाम पहुंचते हैं। कठिन तपस्या, मौन साधना और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था ने कोसमनारा बाबा धाम को रायगढ़ की धार्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है।
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बनोरा आश्रम रायगढ़ का प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल, जहां साधना के साथ सेवा का भी मिलता है संदेश
रायगढ़ शहर से करीब 16 किलोमीटर दूर स्थित अघोर गुरुपीठ ब्रह्मनिष्ठालय, बनोरा आश्रम धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन की दृष्टि से जिले का महत्वपूर्ण स्थल है। यहां आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को सुकून का अनुभव कराता है। आश्रम की स्थापना 31 जुलाई 1993 को पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी द्वारा की गई थी। करीब 3.50 एकड़ में फैले परिसर में अघोरेश्वर अवधूत भगवान राम जी की भव्य प्रतिमा स्थापित है, जहां श्रद्धालु दर्शन और ध्यान के लिए पहुंचते हैं।
बनोरा आश्रम की खासियत केवल आध्यात्मिक वातावरण ही नहीं, बल्कि सेवा की परंपरा भी है। आश्रम द्वारा विद्यालय और अस्पताल का संचालन किया जाता है तथा जरूरतमंदों के लिए चिकित्सा शिविर भी आयोजित किए जाते हैं। सामाजिक जागरूकता और लोककल्याण के कार्यों ने इस स्थान को विशेष पहचान दी है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आश्रम में विशेष आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। प्राकृतिक शांति, आध्यात्मिक वातावरण और सेवा भावना का संगम बनोरा आश्रम को रायगढ़ के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करता है।
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सिंदूर पार्क: हरियाली के बीच शौर्य और सुकून का एहसास
रायगढ़ शहर के इतवारी बाजार क्षेत्र में स्थित सिंदूर पार्क शहर के बीच विकसित एक खूबसूरत हरित और मनोरंजन स्थल है। ऑक्सीजन पार्क के रूप में विकसित इस परिसर को अब ‘सिंदूर पार्क’ के नाम से नई पहचान मिली है। हरियाली से घिरा यह पार्क सुबह-शाम सैर, योग, व्यायाम और परिवार के साथ समय बिताने के लिए आकर्षक स्थान है। पार्क की खासियत केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं, बल्कि इसके नाम से जुड़ी देशभक्ति की भावना भी है। यह पार्क ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सशस्त्र बलों के शौर्य और पराक्रम को समर्पित है। यहां लगाए गए विभिन्न प्रजातियों के पौधे और विकसित हरित क्षेत्र पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं। बच्चों के लिए खेल क्षेत्र, पाथवे, ओपन एयर जिम और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए ओपन एयर थिएटर जैसी सुविधाएं इसे शहरवासियों के लिए उपयोगी बनाती हैं। प्रकृति की शीतलता और देशभक्ति के गौरव को एक साथ महसूस करने के लिए सिंदूर पार्क रायगढ़ का एक नया आकर्षण है।
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रायगढ़ का गजमार पहाड़ मंदिर: आस्था और प्रकृति का अनोखा संगम
रायगढ़ शहर की पहचान से जुड़े प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों में गजमार पहाड़ स्थित पहाड़ मंदिर का विशेष स्थान है। शहर के बीचों-बीच पहाड़ी की चोटी पर स्थित श्री संकटमोचन बजरंगबली मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। जिला प्रशासन की पर्यटन सूची में भी पहाड़ मंदिर को रायगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल किया गया है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पहाड़ी पर बनी घुमावदार सीढ़ियों से होकर ऊपर जाना पड़ता है। अलग-अलग स्रोतों में सीढ़ियों की संख्या करीब 700 बताई गई है। चोटी पर पहुंचने के बाद भगवान हनुमान के दर्शन के साथ रायगढ़ शहर और आसपास के हरियाली से भरे क्षेत्र का सुंदर विहंगम दृश्य दिखाई देता है। गजमार पहाड़ मंदिर में हनुमान जी के साथ शिव और दुर्गा माता के मंदिर भी हैं। हनुमान जयंती, सावन और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
अब गजमार पहाड़ को धार्मिक पर्यटन और इको-टूरिज्म स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। वर्ष 2026 में यहां 51 फीट ऊंची कांस्य बजरंगबली प्रतिमा स्थापित करने के लिए भूमिपूजन किया गया है। प्रस्तावित प्रतिमा लगभग 10 टन वजनी बताई गई है। घूमने के लिहाज से धार्मिक श्रद्धा, पहाड़ी का प्राकृतिक वातावरण, शहर का मनोरम दृश्य और मंदिर तक पहुंचने का रोमांच-इन सभी वजहों से गजमार पहाड़ मंदिर रायगढ़ आने वाले पर्यटकों के लिए एक आकर्षक स्थान है।
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औद्योगिक नगरी रायगढ़: उद्योगों के साथ विकास की नई पहचान
छत्तीसगढ़ का रायगढ़ जिला अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और औद्योगिक विकास के लिए देशभर में पहचान रखता है। विशेष रूप से इस्पात, स्पंज आयरन, बिजली और कोयला आधारित उद्योगों की बड़ी मौजूदगी ने रायगढ़ को प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में स्थान दिलाया है। जिले में बड़े औद्योगिक संयंत्रों के साथ-साथ अनेक छोटे और मध्यम उद्योग भी संचालित हैं, जो स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं। रायगढ़ की औद्योगिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण आधार यहां उपलब्ध खनिज संसाधन और ऊर्जा की प्रचुरता है। कोयला आधारित विद्युत परियोजनाओं और लौह-इस्पात उद्योगों के कारण जिले में औद्योगिक गतिविधियां लगातार विस्तारित हुई हैं। इसके साथ ही सड़क, रेल और अन्य परिवहन सुविधाओं के विकास ने भी उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया है।
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